बात सिर्फ 90% की नहीं है

दसवीं कक्षा की पढ़ाई के दौरान मेरी बेटी इश्मिता और मेरे बीच अनगिनत बातचीत हुई—कुछ गंभीर, कुछ भावनात्मक। ये एक रस्साकशी जैसी थी—उसके विचार और मेरे विचार मे।

गहराई में जाने से पहले एक गर्व का पल साझा करना चाहता हूँ। एक बार इश्मिता अपनी क्लास द्वारा आयोजित *अचीवर्स डे* में गई। वापस आकर उसने कहा, *“अगले साल मैं चाहती हूँ कि मेरे माता-पिता उस स्टेज पर हों, मेरी वजह से।”* उसकी आँखों में वो आत्मविश्वास देखकर मुझे और मेरी पत्नी को बहुत खुशी हुई। हमें लगा कि उसने साल की शुरुआत में ही जिम्मेदारी की भावना समझ ली है।

लेकिन जल्दी ही वो गर्व का पल धुंधला होने लगा। उसके तैयारी में गिरावट आने लगी और एक माता-पिता के रूप में हम चिंतित थे। उसकी क्षमता को देखते हुए हमने 98% का लक्ष्य रखा था, उम्मीद थी कि कम से कम 95% तक तो पहुँचेगी।

इसके बाद शुरू हुआ एक रोलर-कोस्टर (उतार - चढ़ाव) सफर। कभी उसके टेस्ट में सुधार दिखा, तो कभी वही ढीला रवैया। इसके बीच वह अपने मस्ती के पलों से भी समझौता नहीं करती थी—पिकनिक, दोस्तों की पार्टी, वेब सीरीज़ और बॉलीवुड फिल्में, सब कुछ चलता रहा।

धीरे-धीरे स्कूल का होमवर्क और टेस्ट बढ़ने लगे तो उसने कुछ क्लासेस अटेंड करना बंद कर दिया। इस पर फिर से चिंता हुई—“अगर अनुशासन नहीं रहा तो प्री-लिम्स और बोर्ड में क्या होगा?”

हमारे घर में कई बार इश्मिता के साथ काउंसलिंग होती रही। मैंने उसे समझाया, “मैं तुम्हें जज नहीं कर रहा, लेकिन तुम्हारे नौवीं के रिजल्ट और अभी की स्थिति देखकर मेरे डेटा एनालिसिस के मुताबिक तुम 90 भी पार नहीं कर पाओगी—95-98% तो भूल ही जाओ।”

उसका जवाब हमेशा शांत और आत्मविश्वासी होता, “आपका डेटा एनालिसिस ठीक है पर ज़िंदगी सिर्फ marks तक की ही बात नहीं है। मैं नंबर ले आउंगी, लेकिन आप मेरे साथ समय बिताइए, मुझे समझिए, मुझ पर विश्वास कीजिए। ये पल—बातचीत, हँसी-मजाक—एक छात्र के करियर में उतने ही जरूरी हैं।”

फिर आया रिजल्ट का दिन। उसने 90% का आंकड़ा पार कर लिया। उस एक पल में सारे प्रेशर जैसे हवा हो गए। हमारे मन में एक ही विचार आया—“ये तो भगवान की कृपा है।”

जैसे ही सारी यादें ताज़ा हुईं, एक बात साफ़ हो गई—यह सफर सिर्फ percentage की दौड़ नहीं था। असली सीख, जो हमें आगे की ज़िंदगी में साथ लेकर चलनी चाहिए—वो ये है कि:

* पढ़ाई के साथ-साथ निरंतर पैरेंटल काउंसलिंग ज़रूरी है (दबाव नहीं),

* बच्चों के साथ क्वालिटी समय बिताना चाहिए, केवल पढ़ाई पूछने के लिए नहीं,

* दोस्तों और मस्ती के पल भी ज़रूरी हैं,

* और सबसे अहम, सकारात्मक (positive) सोच वाले लोगों की संगत होनी चाहिए।

Comments

Popular posts from this blog

It's Not Just About 90%